अंगूर का दाना

 


टियाऊँ टियाऊँ टियाऊँ टियाऊँ...

इस मनमोहक ध्वनि के साथ गाना शुरू होता है और लड़की अपने इंटरोडकशन से बात शुरू करती है। वो कहती है –

“अंगूर का दाना हूँ, सुई ना चुभा देना

सुई जो चुभाई तो रस टपकेगा, जो रस टपकेगा तो किशमिश बन जाऊँगी” 

ये गीत बच्चों के लिए बहुत ज्ञानवर्धक है ऐसा मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ क्योंकि ये गाना जब पहली बार सुना तभी मुझे पता चला कि किशमिश अंगूर में सुई चुभोने से बनती है। मुझे किशमिश पसंद नहीं है इसलिए मैंने का भी ध्यान भी नहीं दिया था, पर जो चीज़ पसंद न हो उसके बारे में भी जानकारी तो होनी ही चाहिए और इसीलिए ऐसे ज्ञानवर्धक गीत बनते रहने चाहिए। आजकल ऐसे गीतों का सर्वथा अकाल है। ऐसी और भी बहुत सी चीज़ें हैं जिनके बनने को गीतों के माध्यम से दिखाया जा सकता है जैसे चारोली कैसे बनती है? पनीर कैसे बनता है? दही कैसे बनता है? इत्यादि। चाहते तो एक पूरी सिरीज़ ही इस पर बन सकती थी। 

ख़ैर, मैंने इस गीत को सुनकर लोगों को मंद-मंद मुस्काते देखा है और उन लोगों की अश्लील सोच पर दुखी हुआ हूँ, फिर सोचता हूँ लोगों का क्या है, वो तो दो फूलों के आपस में टकराने के सीन पर भी भौंहें नचाने लगते हैं, जबकि हवा चलने पर दो फूलों का आपस में टकराना सामान्य बात है, हुंह। दर असल इसमें लड़की अंगूर का प्रतीक लेकर कहना चाह रही है कि मैं अंगूर के दाने की तरह नाज़ुक हूँ और तुम मुझे धोखे रूपी सुई मत चुभाना वरना मैं दुख के मारे सूख जाऊँगी, और इस सूखने को उसने किशमिश के प्रतीक द्वारा दर्शाया है। यहाँ तक कवि अपनी लेखनी के उच्च स्तर पर रहता है पर अंतरे में जैसे भटक जाता है –

“फूलों की तरह रखना मुरझाने नहीं देना

खुशबू की तरहा रखना उड़ जाने नहीं देना”

इसमें लॉजिकल प्रोब्लेम है। फूलों की तरहा तो फूलों को भी रखा जाता है पर वो मुरझा जाते हैं तो इसको भी अगर फूलों की तरहा रखा तो मुरझा जाएगी। ऐसे ही खुशबू को भी हम खुशबू की तरह ही रखते हैं, जूते-चप्पल की तरह तो रखते नहीं पर वो भी आधे दिन में उड़ जाती है। इसको शायद ये कहना था कि फूलों की तरहा मत रखना वरना मुरझा जाऊँगी और खुशबू की तरहा मत रखना वरना उड़ जाऊँगी। ये पंक्तियाँ ही गलत लिखी हुई हैं। अगली लाइन में भी मुझे प्रोब्लेम नज़र आती है, पर बहुत महीन है वो –

“मैं रात हूँ शबाब की, ढल जाने नहीं देना”

देखिये कविता में प्रतीकों के इस्तेमाल के अनुसार देखा जाये तो शबाब की रात बुढ़ापा होती है और ये कह रही है कि मैं शबाब के रात हूँ, मतलब ये पहले ही ढल चुकी है, अब और कोई कैसे इसे न ढलने देगा? कौन है ये लिखने वाला बुलाओ ज़रा, पूरा गलत-सलत लिख रखा है। 

“रातों की मैं रानी हूँ, हर दिल की जवानी हूँ

अंगूर की बेटी हूँ, शराब पुरानी हूँ

ये बात है राज़ की खुल जाने नहीं देना”

कभी कहती है अंगूर का दाना हूँ, कभी कहती है अंगूर की बेटी हूँ, कभी कहती है शराब हूँ, अरे एक पे रेना घोड़ा बोलना या चतुर बोलना, ये क्या रे गोड़ा-चतुर, गोड़ा-चतुर,,,

फिर कह रही है ये राज़ की बात है खुलने मत देना और खुद ही हिल-हिल कर ज़ोर-ज़ोर से गा रही है। अब बताने को बचा है कुछ दूसरों के? और तो और लोग भोंपू लगाकर सुन रहे तेरा राज़। कितनी बेवकूफ़ लड़की है। 

ख़ैर, पीछे-पीछे महेश-किशोर ने बाजा अच्छा बजाया है और कविता कृष्णमूर्ति का भी मन था एक illogical गाना गाने का तो उन्होंने भी गा लिया और मुझे पता चल गया ये कन्फ़्यूज्ड शायर “सावन कुमार” थे। 

सलमान ख़ान की पिच्चर “सनम बेवफा” का गाना था ये। इसमें दुर्योधन ने मनमोहक नृत्य किया है और अंगूर का दाना बनी हैं "ताहिरा खान" जिनका अवतार इसी महान गीत पर नृत्य करने के लिए हुआ था। इसके अलावा एक कालजई फिल्म "फूलन हसीना रामकली" में भी इन्होंने काम किया था।

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