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अंग से अंग लगाना

  **होली विशेष** होली के कई कालजयी गीत बने हैं पर उनमें भी कालों का काल है ये गीत, और जैसा कि आप जानते ही हैं कि मैं उन गीतों का मसीहा हूँ जिन्हें आम जनता समझ नहीं पाती और अपनी ही गलत नज़र के चलते दुत्कार देती है। ये भी ऐसा ही गीत है। यश चोपड़ा और शिव-हरि की जोड़ी ने “रंग बरसे” जैसा गीत रचा और उसके कई सालों बाद उन्हें ज़रूरत महसूस हुई उससे भी आगे का गीत रचने की जो छुप-छुपा कर बातें न करे बल्कि बुल्ला की तरह खुल्ला बात करे। सिलसिला को 13-14 साल हो चुके थे और पीढ़ी पूरी तरह से बदल चुकी थी, अब “चाबे गोरी का यार बलम तरसे” जैसे जुमलों से काम नहीं चलने वाला था। अब सेर्जिकल स्ट्राइक चाहिए थी, तो बक्शी साहब ने वो गाना लिखा कि सब धुआँ-धुआँ कर दिया। ये फ़िल्म थी “डर” और परदे पर इसे सनी देओल, जूही चावला, अनुपम द रष्टरवादी खेर और तन्वी आज़मी गाया था। पर्दे के पीछे अलका याज्ञनिक की खनकती आवाज़, विनोद राठोड की कुरकुरी आवाज़, और सुदेश भोसले की खुरदरी आवाज़ थी। गाने के शुरू होने से पहले टर्म्स अँड कंडिशन्स की घोषणा होती है – “अरे जो जी में आए, तुम आज कर लो चाहो जिसे इन बाँहों में भर लो” पता नहीं ऐसी होली कौ...

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आँखें दो आँखें दो

चोली तेरे तन पर कसी कसी

तेरे जैसी कोई सिरिमती चाहिए

इश्क़ की दुकान चालू है

मेरे कन्ने चक्कू है

मने सोते दिया जगाय

अंगूर का दाना

किस्सिक - झंडुत्व का सिरमौर

लड़की देखी मुँह से सीटी

झ झ झ झ झोपड़ी में च च च च चारपाई