झ झ झ झ झोपड़ी में च च च च चारपाई


 

झ झ झ झ झोपड़ी में

च च च च चारपाई 

क क क क किरण

समझ तो गए ही होंगे कौन सा गीत है। अगर नहीं तो – “क्या संगीत प्रेमी बनेगा रे तू”

इस गीत का बहुत ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व है। कैसे, ये मैं आज आपको समझाऊंगा।

मैंने देखा है लोग इस गीत का काफ़ी मज़ाक़ बनाते हैं, बिना इसे समझे। 80 के दशक में बप्पी लाहिरी ने इंदीवर साहब को कॉन्फ़िडेंस में लेकर ये गुप्त अभियान शुरू किया था जिसमें ऐसे सामाजिक गीत बनाए जाएँगे जो समाज को बदल कर रख दें। पर दुर्भाग्य, कि लोग उसे समझे ही नहीं और उस पूरे दौर को ही उन्होंने खारिज कर दिया। 

इस गीत का अगर आप विडियो देखेंगे तो आपको कांटेक्स्ट ज़्यादा अच्छी तरह समझ आएगा। एक बढ़िया से गार्डेन में नायक और नायिका को एक झोपड़ी दिखाई देती है, जिसमें एक चारपाई जिसे हम गाँव में खटिया बोलते हैं, वो लगी है। और झोपड़ी इतनी गरीब है कि उसमें एक खटिया रखने जितनी ही जगह है। दोनों का ये देखकर भावातिरेक से नाच-गाना निकल जाता है। वे पूरे गार्डेन में नाच-नाच कर खुशी मनाते हैं कि झोपड़ी में चारपाई। लेकिन दोनों बहुत संवेदनशील है, उन्हें उस चारपाई के अकेलेपन का एहसास है। चारपाई क्या चाहती है, उसका जीवन सार्थक कब होता है? जब कोई मनुष्य उस पर बैठे, या लेटे। और दो मनुष्य हो तो उसे संतुष्टि मिलती है कि मैंने आज एक नहीं दो मनुष्यों की सेवा की। लेकिन जिस चारपाई पर कोई बैठता-लेटता न हो उसका दुख आप नहीं समझ सकते, ये दोनों समझ जाते हैं और अगली पंक्ति में बयां भी करते हैं –

“मानुस बिना अंबो रोती पड़ी”

कविता में अंबो का उपयोग बड़ा मधुर है, पर इसका अर्थ न पूछिएगा। 

फ़िर दोनों प्लान बनाते हैं, ताकि उसका दुख दूर कर सकें –

“प्यार का कर ले हंगामा निकल न जाये सुहानी घड़ी”

पर आपकी समझ में ये नहीं आ रहा होगा कि चारपाई देखकर तुरंत उसका दुख दूर करने की बजाय दोनों नाचने क्यों लगे? और कपड़े बदल-बदल कर नाच रहे हैं। तो ये बात आपको आगे समझ आएगी। इस गीत का सामाजिक महत्व है ऐसा मैंने इसलिए कहा कि ये हिन्दी और मराठी का अभूतपूर्व संगम है। अंतरा देखिये –

“माका तुज़ा प्यार पाहिजे, प्यार पाहिजे प्यार पाहिजे”

इस पर नायक कहता है – कुकरू कुकरू, ये बस मस्ती का इज़हार है, कुकरू सुनकर आपको भी मस्ती आ जाती है। 

“तेरे जैसा यार पाहिजे, यार पाहिजे अरे यार पाहिजे”

अब देखिये हिन्दी और मराठी कैसे दूध और पानी की तरह मिल गए हैं। उन्हें पहले ही अंदेशा था कि महाराष्ट्र में भैया लोगों पर अत्याचार होंगे इसलिए दूरदर्शिता से ये गाना बनाया था, पर लोग समझ नहीं पाये। अब अगला अंतरा आप पढ़ेंगे तो समझेंगे कि आखिर क्यों ये चारपाई को और तरसा कर नाचने लगे।

“रोको नहीं करने दो, प्यार दो दिलवालों को

टोको नहीं भरने दो, मन में तन के उजालों को

तू अपने घरवालों को मना ले, मैं अपने घरवालों को

कुकरू कुकरू”

चाहे उन्हें अकेली झोपड़ी और चारपाई मिल गई, लेकिन संस्कार देखिये दोनों के कि अपने घरवालों से इजाज़त लेना चाहते हैं एक-दूसरे के साथ झोपड़ी में जाने के लिए। मेरी आँखें भर आईं इस सभ्यता और शराफत को देखकर। मुझे डर बस इतना है कि कोई बदमाश उस झोपड़ी पर कब्जा न कर ले इनके घरवालों के हाँ करने से पहले। क्योंकि झोपड़ियों का चलन तब से ही बंद होने लगा था, लोग सीमेंट के बक्सों में रहने लगे थे। ऐसे में झोपड़ी को पॉपुलर करने का इनका प्रयास सराहनीय था। वरना हम देख ही रहे हैं झोपड़ी वाले अपने आसपास कैसे बेईमानी से दौलत इकट्ठा कर रहे हैं। 

आप बप्पी दा, इंदीवर, किशोर दा, आशा ताई, जितेंद्र और श्रीदेवी के इन प्रयासों को सफ़ल बनाएँ और एक बार अपने आँखों और कानों की कुर्बानी दें। ये फ़िल्म “मवाली” का गीत है जो 1983 में आई थी, जी हाँ उसी वक़्त जब खयाम जैसे संगीतकार उमराओ जान और रज़िया सुल्तान जैसी बकवास कर रहे थे जिनका आम आदमी से कोई सरोकार नहीं। “ए दिल-ए-नादां, आरज़ू क्या है जुस्तजू क्या है” अब कोई मतलब है इसका आम आदमी के लिए?

खैर!

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