चोली तेरे तन पर कसी कसी

 




इंदीवर साहब के लिए मेरे मन में बहुत दुख है। उन्होंने कितने महान झंडू गीत रचे हैं पर कभी किसी ने उन्हें क्रेडिट नहीं दिया। यहाँ तक कि “चोली” गीतों के पितामह का पद भी आनंद बक्शी को दे दिया जबकि उससे लगभग दस साल पहले इंदीवर लोगों का इस महत्वपूर्ण वस्त्र की तरफ़ ध्यान आकृष्ट कर चुके थे। ये दीगर बात है कि उसके पीछे क्या है ये पूछने की हिम्मत नहीं हुई उनकी पर कसी हुई चोली देखकर गीत तो फूट ही पड़ा और सिर्फ कसी हुई चोली से भी कोई मन में बस सकती है ये गीत उस मनोवैज्ञानिक सत्य का प्रमाण है। शायद इसीलिए इस गीत में कैमरामैन ने भी हीरोइन के चेहरे को कोई तवज्जो नहीं दी है, उसका ज़्यादा ध्यान चेहरे के नीचे ही रहा है। कई शॉट्स में चेहरा काट ही दिया है। कितने समर्पित लोग हुआ करते थे उस जमाने में। 

गीत की शुरुआत ढेर सारे संतरों के पहाड़ी से गिरने के दृश्य से है और कैमरा संतरों से इतना obsessed है कि हीरो हीरोइन भले शॉट में न आयें, संतरे आने चाहिए। उसके बाद अब जाकर संतरों के वो अच्छे दिन आए हैं। तो जितेंद्र जी गा रहे हैं –

“चोली तेरे तन पर तन पर कसी कसी, रहती है तू मन में मन में बसी बसी

जाये न असर तेरी बातों का, उतरे ना ज़हर तेरी आँखों का

ज़िंदगी डसी डसी डसी”

देखिये, इंदीवर साहब किसलिए महानों में महान हैं इस उदाहरण से समझाता हूँ। इन तीन पंक्तियों का आपस में कोई भी संबंध नहीं है, चोली कसी है ठीक है उसका उदाहरण देकर मन में बसी है को जोड़ देना, और फिर तीसरी लाइन में “ज़िंदगी डसी” का प्रयोग दुर्लभतम प्रतिभा की माँग करता है क्योंकि चोली, मन में बसी इन दोनों से डसने का कोई भी संबंध नहीं है पर “जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि” और हमारे कविराज कहाँ से होकर कहाँ पहुँच गए देखिये। और इस डसी का उच्चारण नायक तीन बार करता है जो इस ऊपर से खुश लगते गीत में थोड़ा सा दर्द घोल देता है। सभी की ज़िंदगी डसती रहती है ये कौन नहीं जानता। इतनी गहरी फ़िलॉसफ़ि को सिर्फ एक शब्द की तीन आवृत्तियों से बयां कर देना दुर्लभतम प्रतिभा की दरकार रखता है, फिर भी ये दुनिया इंदीवर को छोड़ शैलेंद्र को महान मानती है। क्या ही कहें?

ख़ैर, इसके जवाब में नायिका क्या कहती है ज़रा देखें –

“तेरे तेरे मुख पर मुख पर हँसी हँसी, तेरी छवि मन में मन में बसी बसी

घेरा है मुझे तेरी राहो ने, जकड़ा है मुझे तेरी बाहों ने

जवानी फंसी फंसी फंसी फंसी”

आप देखिये लड़की को लड़के के कपड़ों में इंटरेस्ट नहीं है वरना जवाब में वो भी कह सकती थी कि “बनियान तेरे तन से सटी सटी” या “टी शर्ट तेरी तेरी फटी फटी” पर नहीं, लड़कियां हमेशा भाव को वरीयता देती हैं, उन्हें प्रकृति ने वैसा ही बनाया है पर हमारा नायक छिछोरपन छोड़ ही नहीं रहा देखिये अंतरा –

“आ तीखी चितवन, आ झाँके यौवन 

ऐसी है तू जवान, काम की तू कमान, कहना क्या तेरा”

इसको ताकने-झाँकने से ही फुर्सत नहीं। इससे एक बात और साफ़ होती है कि इंदीवर साहब ने स्त्री और पुरुष के प्राकृतिक अंतर को भी इस गीत के द्वारा स्पष्ट किया है। ये बात इसके बाद लड़की जो कहती है उससे भी स्पष्ट होती है, मैं लिखूंगा नहीं आप खुद सुनिए। इसके आगे नायक फिर अपनी वही ख़ब्त जारी रखता है –

“आ होंठ प्याले हैं, आ मधुशाले हैं

जिसने भी प्यार का रस पिया, वो जिया, ज़िंदा वही”

मतलब आदमी अर्जुन है, वो अपना ध्येय नहीं भूल रहा।  प्यार मोहब्बत की तो बातें भी नहीं कर रहा ये आदमी। और भोली लड़की देखो क्या कहती है –

“आ तेरे होंठों की, आ मैं हूँ मुरली

चाहे जब तू बजा, चाहे जब तू नचा, नाचूँगी मैं”

और नाचने से याद आया, इस गाने में दोनों ने जो नृत्य किया है उस पर फिर एक लंबा चौड़ा लेख लिखा जा सकता है। एक-एक हरकत जैसे दूसरे ग्रह से आई है। जितेंद्र जी तो आपको मालूम ही है कितना बढ़िया नाचते थे। 

तो मेरी सलाह पर इस गीत का रसास्वादन कीजिये और इंदीवर साहब को ऐसी महान साहित्यिक रचना और बप्पी दा को ऐसे कठिन बोलों को धुन में बाँध देने के लिए दुआएँ दीजिये। आज प्रेम दिवस पर इससे बेहतर तोहफ़ा मैं आपको नहीं दे सकता। 

Film - #Hoshiyar (1985)

Sung By - #kishorekumar and #ashabhosle

Happy Valentines Day!

#BappiLahiri #jitendra #meenakshiseshadri #filmmusic #jhandugaane #jhandusongs #80smusic #CHOLI #cholisongs

Comments

Popular Posts