इश्क़ की दुकान चालू है
लोग ए आर रहमान को फिजूल में प्रयोगधरमी बताते हैं पर मैं कहता हूँ “अनु मलिक” ज़्यादा प्रयोगधरमी हैं। आज सब भूल चुके हैं लेकिन मैं नहीं भूला उनका महान योगदान संगीत के क्षेत्र में। पहले फ़िल्म "गंगा जमुना सरस्वती" में उन्होंने "डिस्को भांगड़ा" की ईजाद की और 1994 में “डिस्को मुजरा” नामक एक नई चीज़ पेश की थी। जैसे आज के युग में हर चीज़ में चॉक्लेट घुसा देने की ख़ब्त लोगों पर सवार हुई थी वैसे ही अनु मलिक चाहते थे कि हर संगीत में डिस्को घुसेड़ दिया जाये। ये उस समय के लिहाज से बहुत क्रांतिकारी खोज थी। इसके गायन, वादन और यहाँ तक कि प्रदर्शन में भी एक नई ही बात थी। इसमें मुजरे की नज़ाकत और डिस्को के झटके दोनों ही देने होते हैं। और कहना न होगा कि न सिर्फ अनु जी ने, बल्कि इला अरुण ने और इस गीत पर नृत्य करने वाली अदाकारा ने अपने जीवन का सार उंडेल दिया है इस गीत में। और माया गोविंद के बोलों की तो जितनी तारीफ़ की जाये कम है। गीत मुजरे की तरह शुरू होता है देखिये –
“कजरा लगा के, गजरा सजा के
बिंदिया झुका के, चूड़ी खनका के”
और अचानक सरपट डिस्को में घुस जाता है –
“आए हैं करने हम डिस्को मुजरा
डिस्को मुजरा, डिस्को मुजरा”
और इसके बाद ये गाना आपको चैन नहीं लेने देता, घड़ी के पेंडुलम की तरह एक बार मुजरे में घुसता है और लहरा कर फिर डिस्को में घुस जाता है। जैसे आपने आइसक्रीम विथ हॉट चॉक्लेट अगर खाया हो तो ज़बान पर कभी ठंडा स्वाद होता है तो कभी गरम। और अगर आप साथ में विडियो भी देख रहे हैं तो इस आइस क्रीम में मिर्ची और पड़ जाती है। इसके बाद इला अरुण बड़े ही निर्मम तरीके से कहती हैं –
“ऐसा तड़पाया मुझे दिले बेक़रार ने
मस्त मदमस्त मुझे कर दिया यार ने”
“दिले बेक़रार” देखिये उच्च स्तर की ग़ज़लों वाली भाषा है और फिर अगली ही लाइन में डिस्को है और वो भी कोई ऐसा वैसा नहीं, मस्त और मदमस्त, दोनों का उपयोग करने वाला एकमात्र गीत है ये। परदे पर जो अभिनेत्री है वो भी मुजरे वाली नज़ाकत से नहीं डिस्को वाली बेदर्दी से नाच रही है, ऐसे-ऐसे झटके देती है कि आपको चक्कर आ जाते हैं। अच्छा और इसके बाद माया गोविंद ने जो साहित्य को आम जन जीवन से जोड़ा है उफ़्फ़ –
“इश्क़ की राजा दुकान चालू है
आजा आजा आजा दुकान चालू है”
मतलब इश्क़ को दुकान में रखने की कल्पना अभूतपूर्व है। माया जी को इसके लिए साहित्य का नोबल पुरस्कार मिलना चाहिए था लेकिन क्या करें, पूरी दुनिया हमारे खिलाफ षड्यंत्र ही करती रहती है। अंतरे में तो माया जी ने तबाही मचा दी है –
“मैं तेरी रानी हूँ, तू मेरा किंग दोनों करेंगे डिंग डांग डिंग
कहने लगा तू है रानी, मैं हूँ तेरा जानी किंग
आजा दोनों मिलके करेंगे डिंग डांग डिंग
मैंने पूछा लाये हो क्या, नौ नौ चूड़ियाँ, डाल दो प्यार से तुम, फिर मिटे दूरियाँ
चूड़ी डाली दर्द हुआ, तीर जैसे पार हुआ, ऊपर नीचे आगे-पीछे बिजली का करेंट लगा”
इसके पहले आनंद बक्शी जी ने डिंग डोंग का प्रयोग किया था फिल्म हीरो के गीत में पर माया गोविंद ने उसे एक नई ऊँचाई दी है। दो लोग मिलकर डिंग डोंग भी कर सकते है ये सबसे पहले उन्होंने ही बताया था। वरना हम तो दो लोग मिलकर उस जमाने में अंताक्षरी खेलते थे। ये भी हो सकता है कि किसी प्राचीन समय की ये विलुप्त परंपरा हो जब राजा और रानी मिलकर डिंग डोंग खेला करते हों, तब तो माया गोविंद जी का ये योगदान और भी अविस्मरणीय हो जाता है। और देखिये नायिका कितनी नाज़ुक है कि उसे हाथ में चूड़ी डालने से ही इतना दर्द होता है कि जैसे करंट लगा हो। इससे ये भी साबित होता है कि बेचारी के साथ कभी करेंट लगने की दुर्घटना हुई थी, वरना कैसे पता होता कि करंट लगना कैसा होता है?
अगला अंतरा तो और भी तूफ़ानी है =
“हैलो मिस्टर हैलो, चलो अंदर चलो, वो रॉक सॉन्ग है, बड़ा स्ट्रॉंग है
वो हाय हाय है, वो कडक चाय है, वो गुटर गुटर है, वो गुटुम गुटुम है
लोटन कबूतर है, हाय क्या सनम है
कर गया है बेखबर, ऐसा है वो बाज़ीगर, हनी हनी मेरा हनी, बड़ा है वो जादूगर
मैं भी रंगीन हूँ, वो भी रंगीन है, जो भी देखे बोले हमें, हाय क्या सीन है
गुल का रस जो न पिये, कैसा गुलफाम है, मेरे अँगने में भला उसका क्या काम है
मेरा ही शिकार किया, मेरे ही शिकार ने, मस्त मदमस्त मुझे कर दिया यार ने”
आपने अगर जिबरिश सुना हो तो वो ऐसी भाषा होती है जो इंसान के मुंह से ध्यान की परम अवस्था में निकलती है, उसका कोई मतलब नहीं होता वो आनंद की अभिव्यक्ति होती है। इस गीत को लिखते लिखते माया गोविंद भी उसी अवस्था को प्राप्त हो गई और ईश्वर ने स्वयं उनसे ये पंक्तियाँ लिखवा दीं जिसमें उनके लिखे कुछ पुराने गीतों की भी झलक नज़र आ जाती है जैसे गुटर गुटर, लोटन कबूतर…ऐसा लगता है जैसे नायिका ट्रांस में है और बस बोलती जा रही है, वो हाय हाय है, कडक चाय है, हनी है, बनी है, बाज़ीगर है, जादूगर है....उफ़्फ़! अद्भुत।
और अंत में वो मेरा शिकार किया मेरे ही शिकार ने, ये कविता की उच्चतम अभिव्यक्ति है।
मेरा निवेदन है कि ऐसे मास्टर पीस को अगर आपने अब तक नहीं सुना तो अपने जीवन को निरर्थक होने से बचाये और तुरंत सुनिए। ऐसे गीत बार-बार नहीं बनते।
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