तेरे जैसी कोई सिरिमती चाहिए
तुरूरु से एया एया ओ तक की कठिन यात्रा है ये गीत।
किशोर दा और आशा ताई ने कलेजा उड़ेल के रख दिया है। गाना शुरू होता है तुरूरु तुरु से और फिर जितेंद्र और मीनक्षी शेषाद्री अपनी अपनी इच्छाओं की लिस्ट हमारे सामने रखते हैं। मेरा मतलब है इच्छा तो एक ही है उनकी, पर उस इच्छा की उप-इच्छाएँ हमें बताते हैं। पहले श्री जितेंद्र जी को मौका दिया जाता है क्योंकि वो पुरुष हैं –
“तेरे जैसी मुझे कोई शिरिमती चाहिए
जवानी अजंता की शरमाये ऐसी कोई मुझ रूपवती चाहिए
एया एया ओ एया एया ओ”
ये एया एया ओ किसी प्रकार का कोई इच्छापूर्ति मंत्र लगता है जो सिर्फ़ इंदीवर जी को पता था। तो इन पंक्तियों से ये क्लियर हो जाता है कि इस आदमी को शादी करने की इच्छा है और लड़की से सीधे सीधे कह रहा है कि तेरे जैसी ही चाहिए। और indirectly ये भी कह रहा है कि तूने इतने उत्तेजक कपड़े पहने हैं कि अजंता की मूर्तियाँ भी शरमा जाएँ। और इंदीवर साहब के कवित्व की दाद दीजिये कि उन्होंने श्रीमति नहीं बल्कि “शिरिमती” का प्रयोग किया है, ऐसे ही अवसरों के लिए “साधो-साधो” कहकर आनंद प्रकट करने का विधान शास्त्रों में किया गया है। फ़िर मौका सुश्री मीनक्षी के पास जाता है और वो भी बदले में अपनी फंटसी बताती हैं-
“तेरे जैसा कोई महारथी चाहिए
राजी न हो घरवाले के जो उठा ले जाये, ऐसा जोरदार मुझे पति चाहिए”
और फ़िर वही एया एया ओ वाला मंत्र पढ़ती है।
लड़की ने टीवी पर पौराणिक धारावाहिक बहुत देखे हैं इसलिए महारथी उसे अच्छे लगते हैं। और वो अपने vision में बिलकुल क्लियर है कि घरवाले न माने तो उठा ले जाना, मैं खुद चल के नहीं आऊँगी। पर पिच्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त, अब जितेंद्र अगली डिमांड बताते हैं –
“ओ नाचे मेनका सी वो किन्नरी सी गाये
अंग जिसका छु लूँ तो आग लग जाये”
वामपंथियों ने हमसे ये तक छुपा लिया कि मेनका का डांस सिर्फ़ विश्वामित्र ही नहीं छुप छुप कर जितेंद्र भी देख रहे थे और तभी से उन्होंने ठान लिया था कि ऐसा जो नाचेगी उसी से शादी करूँगा। उस समय स्मार्ट फोन होते तो विडियो भी बन जाता और हम कलयुग के पापी भी उस दैवीय नृत्य का रसपान कर पाते। इतना ही नहीं उसी जमाने में जितेंद्र ने किन्नरी का गाना भी सुना था और मन ही मन सोच लिया था कि विश्वामित्र से आगे निकालना है, उसे तो सिर्फ़ नाच अच्छा मिला, मैं गाना भी इंक्लुड करूँगा, पूरा पैकेज लूँगा। इससे ये भी साबित होता है कि कला के बड़े रसिक आदमी थे श्री जितेंद्र।
“जिसके लिए यारों में जंग छिड़ जाये
राजपूतों वाली बग़ावत चाहिए
एया एया ओ”
इन दो पंक्तियों को सुनकर मैं इंदीवर साहब के सामने साष्टांग हो गया। राजपूतों को वहाँ आदर दे दिया जहाँ वे सोच भी नहीं सकते। यही तो होता है कवि। इसके आगे की पंक्तियाँ सुनने की जहमत आप उठाएँ, मैं बस अगले अंतरे की चार पंक्तियाँ और प्रस्तुत करूंगा, उसके बाद बेहोश हो जाऊँगा, कृपया मुझे कोई उठाए ना आठ-दस घंटे –
“जवानों में जवान, जहीनों में ज़हीन
हो दिल का हसीन विचारों में नवीन
प्रेम की कला में हो सबसे प्रवीण
प्यार की प्यास बलवती चाहिए, एया एया ओ”
इंदीवर जी के अंदर अचानक चन्दन सा बदन घुस गया, या बूटी का धुआँ कि उनके अंदर से गाना खतम होते होते क्लिष्ट हिन्दी की मरोड़ उठी और नवीन, प्रवीण, ज़हीन फूटने लगे और प्यास बलवती तो ज़रूर किसी ऐसी वैसी किताब से लिया है।
कमाल का गाना है, जो नहीं सुने उसको मेरी कसम है। बता दूँ कि फिल्म होशियार का गाना है, जो 1984 में आई थी और ऐसे महान गीतों के संगीतकार तो उस समय एक ही थे, अपने बप्पी दा।
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