मने सोते दिया जगाय
चहुं ओर फेमिनिस्म की भसड़ मची हुई है। फ़ेमिनिस्ट चंडी बनी हुई हैं जो पुरुष का रक्त पिये बिना नहीं मानेंगी। तो इसी माकूल अवसर पर एक अबला की फरियाद क्यों न सुना दी जाये, ताकि इसे 30 साल बाद ही सही, इंसाफ़ तो मिले। उस वक़्त कोई फेमिनिस्म नहीं था इसलिए इसकी फरियाद दब कर रह गई। जो फ़ेमिनिस्ट थीं भी वो खुल कर गालियाँ नहीं दे पाती थीं तो चोरस में विरोध प्रदर्शन करती थीं वो भी सांकेतिक। ऐसे ही फेमिनिस्टों के एक समूह के सांकेतिक विरोध से ये गीत शुरू होता है जिसमें ये सभी “तू तुरु तू तुरु तूतू” की ध्वनि मुँह से निकाल कर दुनिया का ध्यान नायिका की पीड़ा की तरफ़ खींचना चाहती हैं। फ़िर नायिका अपनी व्यथा व्यक्त करती है –
“मने सोते दिया जगाय जाने क्या करिपो
काहे दीपक दिया बुझाय जाने क्या करिपो”
इन पंक्तियों से ये तो ज़ाहिर हो जाता है कि ये बहुत ही मासूम लड़की है, बेचारी दिन भर का काम करके, थक कर सोई है। इस काम में सास के ताने भी इंक्लूडेड हैं। अभी-अभी ही किच्चन की सफ़ाई करके आई होगी। और ये बेशरम मर्द उसे जगा रहा है। दूसरी पंक्ति में भी बहुत गूढ़ अर्थ छुपे हुए हैं, ये 1994 की फ़िल्म है और उसके घर में दिया जल रहा है रोशनी के लिए तो एक मतलब तो ये हुआ कि उसके गाँव में अब तक बिजली नहीं पहुंची है। ऐसे में लोगों के घरों में चिमनी या लालटेन हुआ करती थीं, मेरे घर पर भी थी पर ये इतने गरीब हैं कि इन्हें उन चीजों के लिए घासलेट भी मयस्सर नहीं है तो दिये से काम चला रहे हैं। और उस दिये को भी उस निर्मम आदमी ने बुझा दिया है। उस घुप्प अंधेरे से लड़की को डर लग रहा है। चूँकि उस ज़माने में लड़की पर घासलेट डाल कर जला देने की बहुत सी घटनाएँ होती थीं तो शायद एक डर ये भी रहा हो। तो वो डर रही है और इस डर को गाने में अभिव्यक्त कर रही है। उसके साथ फ़ेमिनिस्ट लड़कियों के साथ फ़ेमिनिस्ट पुरुष भी काले कपड़े पहन कर नाच रहे हैं। काला रंग विरोध की अभिव्यक्ति होता है ये आप ध्यान रखिए। तो ऐसा नहीं है कि सारे ही पुरुष मर्दवादी हों।
आगे वो अपनी परिस्थिति को और भी विस्तार से बताती है –
“कुछ देर पहले छोड़ा था हाथ क्या ना किया था मेरे साथ
फ़िर याद आई कौन सी बात, सोने न देगा क्या सारी रात
फेरे लिए अभी मंडप में सात, फ़िर आ गया वो लेके बरात
दिल मेरा, दिल मेरा, दिल मेरा बड़ा घबराय जाने क्या करिपो”
लड़की इशारों में बता रही है कि अभी हाथ छोड़ा था और पता नहीं क्या किया था। हो सकता है उसने उसे मारा-पीटा हो, कोई नशे की दवाई दी हो कि उसे याद नहीं है कि क्या हुआ था और अब फ़िर से उसे जगा दिया है। लड़की को चिंता है कि सुबह पाँच बजे उठकर नहाकर रसोई में नहीं गई तो सास कितनी गालियाँ देंगी पर ये मुआ समझ ही नहीं रहा है। बस मुझे ये बात समझ नहीं आई कि फेरे लेने के बाद कौन सी बरात आती है? ख़ैर, आगे और भी दर्दनाक हो जाता है गाना –
“वो बस कभी करता नहीं, उसका तो दिल भरता नहीं
आ प्यार कर ले कहता है वो, तैयार हरदम रहता है वो
चाहे कभी मैं सोने गई, चाहे मैं कपड़े धोने गई
कपड़े धोते लिया बुलाय जाने क्या करिपो”
इसमें हालाँकि वो प्यार करने की बात कह रही है लेकिन मुझे यक़ीन है कि इन शिकायतों के बीच आदमी ने उसे आँखें दिखाई होंगी तो वो उसे शांत करने के लिए प्यार की बात करने लगी लेकिन हमें अपने लक्ष्य से नहीं भटकना है। पुरुष आताताई होता है, ये स्थापित तथ्य है और इस लड़की की कविता में छुपे संकेत हमें सही समझने हैं। वो आदमी इसे कोई काम नहीं करने दे रहा, न सोने देता है, न कपड़े धोने देता है। ये सब वो जान बूझकर अपनी माँ की मिली-भगत से करता है, क्योंकि कपड़े नहीं धुलेंगे तो माँ को अगले एक घंटे उसके पूरे खानदान को गालियाँ देने का अवसर प्राप्त होगा। ये सब मिलकर उस अबला को टॉर्चर कर रहे हैं। इसके आगे भी उसकी गुहार है जिसमें अंतिम पंक्ति बहुत दर्द भरी है कि – “मैं पूछती, पूछती पूछती , पूछती रह गई हाय जाने क्या करिपो”
सोच कर देखिये कितने भय के बीच ये इनके बीच रह रही है। उस वक़्त तो कोई इस लड़की की फरियाद को समझा नहीं, सबने गाना समझ कर नाच लिया बस। लक्ष्मी-प्यारे ने संगीत इतना मस्त बनाया कि लोगों को बोल समझ नहीं आए जबकि बक्शी जी ने बहुत दिल से लिखा था। फ़िल्म का नाम भी इस आदमी की तरफ़ ही इशारा करता है – बेदर्दी।
ख़ैर, अगर ऐसा आज होता तो इस आदमी को छठी का क्या चौथी-पाँचवी का भी दूध याद दिला देते।
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