मेरे कन्ने चक्कू है

 


झंडू गाने – 18

आज का समय बहुत विकसित है, सारे दर्शक (कुछ को छोडकर जो रोते रहते हैं) समझदार हो गए हैं। पुष्पा एक और दो के सुपर हिट होने के बाद उस उपेक्षित व्यक्ति को प्रतिष्ठा मिल गई है जिसे इस समाज ने हमेशा खलनायक कहकर अपमानित किया है। आप ही बताइये पुष्पाराज क्या है? भई वो संत है। चन्दन की लकड़ी को पूरी दुनिया में उपलब्ध करवा रहा है। इस प्रकृति ने जो भी चीज़ दी है वो इंसान के उपयोग के लिए दी है ना? पानी दिया पीने के लिए, फ़ल दिये खाने के लिए और चन्दन में इतनी मदमस्त सुगंध क्यों दी है? सूंघने के लिए ही ना? जब आप पानी को पी लेते हो, फ़ल को खा लेते हो तो चन्दन की लकड़ी का उपभोग करने में क्या बुरा है? वही सोच पुष्पा की भी है पर लोग इसे समझते ही नहीं। मेरा मतलब अब तो समझते हैं, पुष्पा को लोग पसंद करते हैं पर पहले नहीं करते थे। यही काम जब शक्ति कपूर, अमरीश पुरी वगैरह करते थे तो उन्हें खलनायक कहकर बेइज़्ज़त किया जाता था। लेकिन उस समय भी कुछ समाज सुधारक फ़िल्मकार हुए हैं जिन्होंने इन उपेक्षित समाज सेवकों को समाज में प्रतिष्ठा दिलाने की कोशिश की है। इन्होंने इन महमानवों के चरित्र चित्रण की कोशिशें की हैं। ऐसी ही कोशिशों में से एक आज का हमारा गीत है। इस गीत को महान समाज सेवक शक्ति कपूर जी पर फिल्माया गया है, जिसमें अपनी विशेषताएँ वे ख़ुद बता रहे हैं।

बहुत सारी लड़कियां शक्ति कपूर जी का सानिध्य पाकर खुश हैं और नाच रही हैं और इस नाच में वे घोषणा करते हैं कि -

मेरे कन्ने चक्कू है। 

लेकिन आप देखिये कि लड़कियां कितना सेफ महसूस कर रही हैं उनके साथ कि फिर भी उनके साथ नाच-गा रही हैं। फिर शक्ति जी अपनी सुपर हीरो वाली पावर का रहस्योद्घाटन करते हैं –

“बिच्छू को काटूँ तो बिच्छू मर जाये

नागन को छेड़ूँ तो नागन डर जाये

मैं हूँ रंगीला बड़ा, मैं हूँ ज़हरीला बड़ा

मेरा गुस्सा मेरा प्यार, दोनों बड़े खतरनाक”

और इसके बाद फिर वो याद दिलाते हैं कि –

“मेरे कन्ने चक्कू है”

आप देखिये कि भाषा से शक्ति जी राजस्थानी लग रहे हैं और इतने पैसे होने के बाद भी उन्होंने अपनी भाषा, अपनी संस्कृति का साथ नहीं छोड़ा है। वो चाहते तो कह सकते थे कि “आई हैव अ नाइफ” पर नहीं, सच्चे सपूत हैं वे भारत माता के। और आप उनकी बातों पर गौर करिए, कौन सा सुपर हीरो है जो बिच्छू को काट सकता है? नागन को छेड़ सकता है? आपने देखा है कोई? सुपर मैन, आइरन मैन, हल्क? नहीं! ये सिर्फ हमारे शक्ति जी के ही बस की बात है। लेकिन हम तो हैं हीन भावना के शिकार, अपने लोगों को आगे ही नहीं बढ्ने देते। अगर आगे बढ़ाया होता तो शक्ति जी आज अवेंजर्स का हिस्सा होते। 

अच्छा ऐसा नहीं है कि वे अपनी ही हाँक रहे हैं, अंतरे में वे लड़कियों से उनकी ऑनेस्ट ओपिनियन भी ले रहे हैं –

“अच्छा मेरी सहेलियों, मेरे कन्ने आओ, और मुझे ये बताओ

मैं हूँ ज़ीरो”

लड़कियाँ ज़ोर से कहती हैं – “नो नो”

“मैं हूँ हीरो”

लड़कियाँ – “येस येस येस”

तीन बार येस है मतलब लड़कियाँ उसे हीरो दिल से मानती हैं। शक्ति जी बार-बार, हर अंतरे में दोहराते हैं कि “मैं हूँ ज़हरीला बड़ा, मैं हूँ रंगीला बड़ा” अर्थात वे दुश्मनों के लिए जहरीले हैं और दोस्तों के लिए रँगीले हैं। हर अंतरे में वे लड़कियों से सवाल पूछते हैं, ये क्लियर करने के लिए कि कहीं औपचारिकता के लिए तो तारीफ नहीं कर रही। जैसे पूछते हैं कि “मैं हूँ बुज़दिल” तो लड़कियाँ तुरंत कहती हैं “नौ नौ नौ”, फिर पूछते हैं कि “मैं हूँ क़ातिल” तो लड़कियाँ कहती हैं “येस येस येस”। अब आप गलत ही समझेंगे मुझे मालूम है। अरे भाई क़ातिल का मतलब हत्यारा ही नहीं होता है। लड़कियां येस कह रही हैं मतलब लड़कियां उस पर मर मिटी हैं इसलिए ऐसा कह रही हैं। तुम लोग गलत समझने को तैयार ही रहते हो यार, इसीलिए समाज में सब झगड़ा होता है। 

ख़ैर, इन सब बातों के बीच में जो मुख्य बात एक हज़ार बार रिपीट होती है वो यही है कि –

“बिच्छू को काटूँ तो बिच्छू मर जाये

नागन को छेड़ूँ तो नागन डर जाये”

शक्ति कपूर जी ने बहुत कोशिश की कि अपनी बिरादरी को सम्मान दिला सकें पर उस समय की जनता ने उन्हें और उनके साथियों को खलनायक ही समझा और हीरोइन के साथ ठुमकने वाले प्रतिभाहीन आदमी को हीरो पर अब समय बदल रहा है। पुष्पा राज आख़िर कामयाब हो गया है असली हीरो को स्थापित करने में, अब हम पहचान गए हैं और मैं पुराने वक़्त के हीरो, जिन्हें विल्लन समझा जाता था, उन्हें भी न्याय दिलाऊँगा, ये मेरा संकल्प है। 

इस कालजयी गीत को गाया था “सुदेश भोसले” ने, धुन तैयार की थी “लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल” ने और लिखा था महान “आनंद बक्शी” ने। और ये कला फिल्मों में मील का पत्थर फिल्म “वीरू दादा” का गीत है। 

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