लड़की देखी मुँह से सीटी

 


इक्का-दुक्का ही गीत बने होंगे जो इंसान की मेंटल हैल्थ को पॉइंट आउट करते हों। हमारा आज का महान गीत उन्हीं इक्का-दुक्का में से इक्का या दुक्का है। इसमें दो आदमी हैं जिन्हें मूड स्विंग्स की समस्या है जो मुखड़े से ही स्पष्ट हो जाता है –

“हम दोनों हैं अलग-अलग, हम दोनों हैं जुदा-जुदा

इक दूजे से कभी-कभी, रहते हैं हम खफ़ा-खफ़ा”

दोनों ये जानते हैं कि वे एक दूसरे से बिल्कुल अलग प्राणी हैं पर पूरी तरह अलग भी नहीं हैं ये उनकी भाषा से स्पष्ट होता है, क्योंकि दोनों को ही शब्दों के जोड़े बहुत पसंद हैं जैसे अलग-अलग, जुदा-जुदा, कभी-कभी, खफ़ा-खफ़ा...पर इन्हें ये नहीं पता कि अलग-अलग और जुदा-जुदा का अर्थ एक ही होता है। ख़ैर, साहित्य पढे हुए लोग नहीं हैं पर रसिक तो लगते ही हैं। इन दो पंक्तियों के बाद अचानक इन्हें मूड स्विंग का दौरा पड़ जाता है और कुछ और ही बात करने लगते हैं

“लड़की देखी मुँह से सीटी, बजे हाथ से ताली”

मुझे लगता है यहाँ ये अपनी बीमारी को इक्सप्लेन कर रहे हैं कि लड़की को जैसे ही देखते हैं इनकी सीटी और ताली बजने लगती है। इन्हें तुरंत किसी मनोचिकित्सक की ज़रूरत है। लेकिन इस एक पंक्ति के बाद इन्हें मराठी का दौरा पड़ जाता है और इन्हें जो चार-पाँच मराठी शब्द आते हैं उन्हें बड़बड़ाने लगते हैं –

“साला उप्मा आइगा आईला, पोरी आली आली”

ऐसा लगता है कि बोलते-बोलते ही इन्हें लड़की दिख जाती है और इन्हें दौरा पड़ जाता है इसीलिए मराठी में ही हिंट दे रहे हैं कि “पोरी आली” अर्थात लड़की आ रही है। और इसके बाद दोनों खिलाड़ी, अनाड़ी का एक-दूसरे को ख़िताब देने लगते हैं – “मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी, तू खिलाड़ी मैं अनाड़ी”। 

तभी कानों में ड्रिल करती हुई एक तीखी-भच आवाज़ गूँजती हो जो राष्ट्रीय एकता की भावना को प्रबल करने के लिए कहती है कि – “चाहे गढ़वाल की हो, या नैनीताल की हो, चाहे पंजाब की हो, या फिर बंगाल की हो, लवली हसीन कोई दिल से ढूँढेंगे, नॉट परमानेंट टेम्पररी ढूँढेंगे”

मुझे अफसोस है कि हमारे मध्यप्रदेश के साथ हमेशा भेद-भाव होता आया है, इसमें हमारा नाम नहीं है। ख़ैर, काफी खुले विचारों का व्यक्ति है जिसे कहीं की भी लड़की चाहिए, बस शर्त इतनी है कि लड़की होनी चाहिए, और “हम तो फकीर हैं जी” की तर्ज पर उसे टेम्पररी ही चाहिए ताकि जब चाहे “झोला उठा के निकल जाये”। 

इसके बाद दोनों खूब नाचते हैं और अंतरे में पूरी तरह से अपनी बीमारी को विस्तृत रूप से बताते हैं कि लड़की को देख कर दिल धक-धक धड़कने लगता है, ये बीमारी इतनी गंभीर है कि दोनों भगवान को दोष देने लगते हैं कि उसने लड़कियों को बनाया ही क्यों? एक पानी फोबिया होता है जिसमें पानी देखकर इंसान की ऐसी हालत होने लगती है, इन दोनों को लड़की फोबिया है और बहुत एडवांस स्टेज पर है ऐसा लग रहा है। पहले अंतरे में दोनों बहुत घबराए हुए, डरे हुए लग रहे हैं लेकिन जैसा मैंने कहा इन्हें मूड स्विंग्स की शिकायत है, और हो सकता है कि मल्टीपल पर्स्नालिटी डिसऑर्डर भी हो क्योंकि ये लोग कभी कुछ कहने लगते हैं और कभी उसका उल्टा कहने लगते हैं। अगले ही अंतरे में ये एक लड़की को घरवाली बनाने की बात करते हैं, पर इनको लगता है कि वो लड़की इनके घर आकर दिन में रावण जलाएगी ताकि दशहरा मन जाये और रात में पटाखे फोड़ेगी ताकि दीवाली हो जाये-

“हर दिन तेरा मने दशहरा, रात बने दीवाली”

 अब बताइये भला कोई लड़की किसी के घर में रावण क्यों जलाएगी? और रोज़ रात को पटाखे क्यों फोड़ेफ़ी? और फोड़ेगी तो पर्यावरण का कितना नुकसान होगा? और फिर उन लोगों को रोज़ व्हात्सप्प पर मैसेज डालने पड़ेंगे, ईद पर बकरे कटने से जो हर शहर में नाव चलानी पड़ती है उसके। उनके ऊपर कितना भार आ जाएगा, वो लोग वैसे ही बहुत प्रैशर में जीवन व्यतीत करते हैं, उन्हें रोज़ किलो से गालियाँ बकनी पड़ती हैं, किस किस ने क्या-क्या नहीं किया ये ध्यान रखकर गालियों से सुसज्जित करके बताना होता है, चाहे वो आदमी 500 साल पहले मर गया हो।

अब देखिये अभी घरवाली बनाने की बात कर रहे थे और अचानक फिर बीमारी के लक्षण बताने लगते हैं –

“लड़की देखी मुँह से सीटी बजे हाथ से ताली”

अब अगर ये लड़की को घरवाली बना लेंगे तो सोचो दिन भर इनकी सीटी और ताली ही बजती रहेगी।  

इन दोनों को तुरंत इलाज की ज़रूरत है, मैं जनता से अपील करूंगा कि इनकी मदद करें।

इस महान गीत को काग़ज़ पर उतारा था "माया गोविंद" ने जिन्होंने खुद महिला होकर ठरकी पुरुष की भावनाओं को इस कदर समझा और उसी कदर संगीत बनाया अनु मालिक ने और उसे उसी ठरकीपने के साथ गाया है उदित नारायण और अभिजीत ने।   

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