गाड़ी चली बड़ौदा से जाने को रतलाम

 


झंडू गाने – 1

आज एक पुराना गीत कानों में पड़ा तो बहुत समय से मन में सुसुप्त इच्छा जाग्रत हो गई, एक सिरीज़ “झंडू सोंग्स” के नाम से चलाने की। हमारे फ़िल्म संगीत में अगर नायाब नगमें हैं तो ऐसे नगमें भी हैं जिन्हें “झंडू” कहा जा सकता है। ये अक्सर द्विअर्थी होते हैं और अगर न हो तो इनका कोई अर्थ ही नहीं होता, पर इनमें एक एलिमंट तो होता है जिसे एंजॉय किया जा सकता है। 80 के दशक में तो इनका खज़ाना छुपा हुआ है, बल्कि 90स में भी बहुत बने हैं। और ऐसा भी नहीं है कि उससे पहले नहीं बने हों, संख्या भले ही बहुत कम रही हो लेकिन झंडू सोंग्स का अस्तित्व हमेशा से रहा है। आज तो हर गाना ही झंडू गाना बन रहा है और लोग लहालोट हो रहे हैं। बच्चे “आज की रात हुस्न का मज़ा आँखों से” दिला रहे हैं ठुमक कर और उनके माँ-बाप लहालोट हो रहे हैं। ये झंडू आज के समाज का भी प्रतिनिधि शब्द है। झंडू नाम मित्र @nikhil का दिया हुआ है जो पहले ऐसे कुछ गीत पोस्ट करते रहते हैं। उन्हीं की इजाज़त के साथ शुरू करते हैं।

गोविंदा के अच्छे समय में झंडू फ़िल्में उनका ट्रेडमार्क थीं। उसी दौर में एक फ़िल्म आई थी “भाग्यवान” जो इतनी दुर्भाग्यवान थी कि खुद गोविंदा भी उसे भूल गए होंगे। ये बिलकुल ही नहीं चली थी, बावजूद इसके कि इसमें एक अति झंडू गाना था जिसे फ़िल्म की हीरोइन “जूही चावला” गाती हैं। गीत के कालजयी बोल इस प्रकार हैं –

“गाड़ी चली बड़ौदा से जाने को रतलाम

मैं सोई थी रात में कोई कर गया काम

लुट गया मेरा समान ओ दैया

लुट गया मेरा सामान।“

अंतरा और भी खतरनाक है इसलिए नहीं लिख रहे यहाँ, आप खुद ही यूट्यूब पर सुन लीजिये।

सार ये है कि लड़की गाड़ी में यात्रा कर रही थी और रास्ते में उसका सामान चोरी हो गया है जिसकी अब नाच-नाच कर शिकायत कर रही है। ऐसा लग रहा है कि ये लड़की साक्षी भाव को उपलब्ध हो चुकी है जिसमें अपने नुकसान को भी ये आनंद के साथ देख पा रही है। ऐसा व्यक्ति सुख हो या दुख, दोनों को सम भाव से देखता है, कभी विचलित नहीं होता। यहाँ तो लड़की और भी आगे निकल चुकी है, जिसमें सिर्फ विचलित नहीं होना ही नहीं बल्कि ये उसे एंजॉय कर रही है। इसी स्थिति को प्राप्त करने पुराने लोग बरसों तपस्या करते थे पर फिर भी एंजॉय नहीं कर पाते थे, उल्टे गुस्सैल हो जाते थे। इस अद्भुत रचना के लिए इससे जुड़े सभी लोगों को साधुवाद। 

और हाँ, इसे गाया था कविता कृष्णमूर्ति ने।  

ये शाहकार एम जी हशमत का लिखा हुआ है और इसका संगीत आनंद-मिलिंद ने बनाया था जो उस वक़्त गोविंदा की फ़िल्मों के स्थायी संगीतकार थे। 

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