शादी बिना जो कंवारी, इसमें करे सवारी
झंडू गाने – 6
रामानन्द सागर की रामायण आपने देखी होगी। बचपन में उसका सबसे इंट्रेस्टिंग पार्ट होता था जब युद्ध में तरह-तरह के तीर छोड़े जाते थे। 5-7 सामान्य तीर छोडने के बाद योद्धा कोई भारी तीर निकालता था और मंत्र पढ़कर छोडता था। अब हम भी उस मक़ाम पर पहुँच चुके हैं, आज का ये तीर बहुत भारी है, इसे मंत्र पढ़कर मैं आपकी तरफ़ छोडता हूँ।
मिथुन दा का एक ज़माना था जब बप्पी लाहिरी के साथ मिलकर उन्होंने गदर मचा रखा था। उसी ज़माने में फिल्म आई थी “मुद्दत”। इस फ़िल्म में मिथुन दा की हीरोइन थी जयाप्रदा। मिथुन दा एक डांसर थे इसमें और अपने स्टेज प्रोग्राम में ही उन्होंने ये गीत गाया था। इस गीत को decode करने में मेरे दिमाग का बहुत दही हुआ है, कि आख़िर कवि कहना क्या चाहता है? गुलज़ार साहब को challenge है कि इसके मुक़ाबले का कठिन कोई गाना लिख कर दिखा दें। इंदीवर साहब ने इस एक ही गीत से गुलज़ार साहब को चारों ख़ाने चित कर दिया है। मैंने पहले जब इसके बोल सुने, फ़िर लिखकर देखे तो मेरा सर भन्ना गया। ये बोल कुछ इस तरह हैं =
“लड़की लड़की लड़की लड़की लड़की
शादी बिना जो कंवारी, इसमें करे सवारी
चलो ओ चलो ओ गाड़ी में
नहीं चलो तो बेजान”
अब आप थोड़ा रुककर कोशिश कीजिये इसे डिकोड करने की।
अब आगे बढ़िए, दर असल इसमें मिथुन दा एक पट्टे वाला टाइट पाजामा पहन कर नाच रहे हैं और पीछे चड्डी पहन कर बहुत सारी लड़कियां हैं जो चोरस में गा रही हैं “लव एक्सप्रेस”। अब समझे आप? ये रेलगाड़ी की बात कर रहे हैं। चलिये मुख्य मुद्दा तो हल हुआ लेकिन फ़िर भी बहुत गूढ बातें इसमें कही गई हैं जो ऊपर ऊपर से समझ नहीं आएंगी। जैसे पहली लाइन में लड़की को पुकारा जा रहा है और एक स्पेसिफिक कंडिशन रखी गई है, कि शादी बिना जो कुंवारी। अब ये बड़ी गहरी बात है, इसमें सारी situations समा गई हैं। अब आप कहेंगे शादी बिना जो कंवारी तो क्या शादी कर के भी कंवारी होती हैं क्या? तो जवाब है हाँ।
और दूसरी कंडिशन ये भी है कि बिना शादी के भी कुंवारी न हो इसके भी chances हैं, तो ये खाप पंचायती गाना बहुत ही, मतलब बहुत ही स्पेसिफिक कंडिशन रख रहा है, वो भी सिर्फ चार शब्दों में। है कोई और गीतकार जो इतने कम शब्दों में इतना सारा बोल सके?
मुश्किल यहीं हल नहीं होती, अगली दो पंक्तियों को तो मैं अब तक डिकोड नहीं कर पाया हूँ – “चलो ओ चलो ओ गाड़ी में, नहीं चलो तो बेजान”
आप लोग अगर मदद करेंगे तो मेहरबानी होगी।
अब अंतरे पर गौर फरमाएँ –
“इंजन है हर लड़का, हर लड़की एक बोगी
जब तक मिले न दोनों, रेल न पूरी होगी।“
यहाँ तो ग़ालिब को भी फोड़ दिया है इंदीवर जी ने। आप छंद, मात्रा, रदीफ़, क़ाफ़िया सब मिला लें, ये एक सम्पूर्ण शेर है। मतलब इतने सही मीटर में हैं दोनों पंक्तियाँ कि चूम लेने को दिल करता है। अब भावार्थ भी समझेंगे तो कसम से मर जाने को दिल करेगा। इसमें कवि कहता है कि हर लड़का इंजन है, जो गाड़ी को आगे बढ़ाता है और “हर” लड़की बोगी है...अब आप समझिए, लड़का बहुत ही चालाकी से सब समझा गया। कौन सी रेल आपने देखी है जिसमें इंजन के साथ एक ही बोगी लगी हो? उसके पीछे बहुत सारी बोगियाँ होती हैं, जिन्हें इंजन एक साथ खींचता है। तो लड़का इशारा दे रहा है कि हर लड़की potential बोगी है मेरी जिसको मैं जोड़ सकता हूँ एक के पीछे एक। और बोगी में चूंकि इंजन नहीं होता, खाली होती है तो वो भी इसी लाइन को दोहरा रही है। चालू इंजन!
तो इंजन अपनी रेल पूरी बनाए तब तक आप ये गाना सुनिए, और गुनिए क्योंकि ऐसे गीत चेतना की उच्चतम अवस्था पर पहुँच कर ही बनाए जा सकते हैं। 80 के दशक तक हमारे गीत-संगीतकार उस अवस्था को प्राप्त हो गए थे पर समीक्षक नहीं हो पाये थे इसलिए वे कभी समझ ही नहीं पाये।
ये गीत बुरे बिलकुल नहीं थे, बल्कि जिसे किशोर दा और आशा ताई ने गाया हो वो बुरा हो सकता है भला?
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