ना उन्नीस से कम हो न इक्कीस से ज़्यादा
रात मेरे सपने में एक गाना आया, और रूआँसा सा होकर देखने लगा।
मैंने पूछा, क्या हुआ भाई? तो बोला मेरे साथ हमेशा से नाइंसाफ़ी होती आई है, मेरी पैदाइश के वक़्त से। मुझे कौतूहल हुआ, मैंने प्रश्नवाचक निगाहों से देखा, जवाब में उसने याचक निगाहों से देखा और कहा, हम दोनों एक ही माँ के जाये हैं, पर उसे सब लोग जानते हैं, जब भी झंडू गानों की बात निकलती है, सब उसका नाम लेते हैं। उसे सबसे ऊपर बताते हैं, मेरा सब कुछ जलकर रह जाता है। मैं जानता हूँ कि मैं हर तरह से उससे बेहतर हूँ, मुझसे ज़्यादा झंडू वो तो क्या, और भी बहुत कम ही गाने मिलेंगे, पर मेरे अंदर इला अरुण की आवाज़ और “उह…आह” नहीं है तो लोग मुझे हेय दृष्टि से देखते हैं।
मुझे अब उसके लिए करुणा पैदा हो रही थी, मैं उसे पहचान गया था। सचमुच ये अपने बड़े भाई से ज़्यादा होनहार था, उससे कहीं ज़्यादा झंडू था पर हाय रे ज़माना, तूने इसे ना पहचाना। इन दोनों की मम्मी थी फ़िल्म “दलाल”, जी हाँ, हमारे सबसे प्यारे प्रभु जी, मिथुन दा की फ़िल्म। फ़िल्म के नाम से झटके से जो आपको याद आया होगा, वो होगा “चढ़ गया ऊपर रे” है ना? और ये बेचारा नहीं याद आया होगा। चलिये मैं याद दिलाता हूँ –
“ना उन्नीस से कम हो, न इक्कीस से ज़्यादा
दीवानों का ना जाने क्या है इरादा,
ज़रा बात खुल के तो समझा दो भाई
मैं हूँ भोला-भाला, मैं हूँ सीधा-साधा”
आ गया ना याद? पर अपने इस भोलेपन की वजह से ये गाना पिछड़ गया।
आप भी इसके दूसरे वाले मीनिंग पर ही जा रहे होंगा, है ना? लेकिन समझिए, ये एक गाँव के भोले भाले आदमी के शहर में आ जाने और उसके तौर-तरीकों से हैरान होने की कहानी है। वो गाँव से आकर अपने भोलेपन में दलाल बन गया है और लोग जो उससे कहते हैं, उसी से जो उसे दर्द पैदा हुआ है, वही वो नाच-गा कर बयान कर रहा है।
इन पंक्तियों से पहले वो भूमिका भी बाँध रहा है –
जहाँ तक भी मेरी नज़र जा रही है
ये गिनती में काहे खता खा रही है
ये उन्नीस मुझे ले के डूबेगा भैया
और इक्कीस मुझे काहे तड़पा रही है
ये चार पंक्तियाँ धीमी लय में गाकर दुखी हो रहा है और फिर अचानक गुस्से में आ जाता है =
“अरे बीच की मिन्डी किधर गई इधर गई या उधर गई
किस खड्डे में उतर गई, जाने भी दो जिधर गई”
अब देखिये कवि ने मिन्डी का कितना खूबसूरत प्रयोग किया है। गांधीजी ने कहा था कि समाज के हर तबक़े को मुख्य धारा में शामिल किया जाना चाहिए। लेकिन फिल्म वालों ने सटोरियों को हमेशा उपेक्षित ही रखा, वो सटोरिये जो गाँव-गाँव में अपना कारोबार फैलाये हैं। गाँव का बच्चा जवान बाद में होता है, सट्टा पहले सीख जाता है। उसे इश्क़ की ज़बान तो ख़ैर कभी समझ नहीं आती पर मींडी फौरन समझ जाता है। हमारे गाँव में आधे नवयुवक इस मिन्डी, पंजा, सत्ता के इर्द-गिर्द अपना जीवन गुलज़ार करते हैं। ऐसी प्रचलित और सम्मानित शब्दावली का गीतों में उपयोग न होना, घनघोर अपमान है, इस देश की आम सटोरी जनता का। और अब तो ये लोग इतिहास भी नए सिरे से लिख रहे हैं। तो सटोरियों को सम्मान देते हुए गाना दलालों को सलामी देता है। और एक ही झटके में इस देश के दो ऐसे तबक़ों से रु-ब-रु करवा देता है जो सबसे ज़्यादा पाये जाते हैं। अब आप इतने भोले तो नहीं हो ना कि दलाल का एक ही मतलब समझो? अरे इस देश में हर चीज़ के दलाल मिलते हैं, इस देश में फिल्मों की शुरुआत करने वाले दादा साहब फालके के अंतिम शब्द यही थे – “ये दलालों का देश है”।
तो इस हिसाब से तो इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म का दर्ज़ा प्राप्त होना चाहिए और इसे हर नागरिक को, हर थोड़े दिन में दिखाया जाना चाहिए। मैं भावनाओं में ज़रा ज़्यादा बह गया, तो इस गीत में नायक 19 और 21 के बीच के किसी confusion में फँसा है और लोगों से मदद माँग रहा है। आप जाने क्या-क्या समझ रहे हैं। उसने बताया भी है कि वो भोला-भाला और सीधा-साधा है, अगर आप कुछ और मतलब इसका समझ रहे हैं तो बड़े टेढ़े-मेढ़े और चालू आदमी हैं।
गुलज़ार साहब के नाम का हव्वा बना रखा है लेकिन वे कभी ऐसे आम आदमी के मन के, उसकी ज़बान के गीत नहीं लिख पाये। इस गीत को लिखकर “माया गोविंद” भी उनसे आगे निकल गई है। ऐसे जब कवियों को सादर नमन जिनहोने दलालों और सटोरियों को भी एक सम्मानजनक स्थान दिलाया। इस गीत को संगीत में जबर्दस्ती बांधा है, झंडू गीतों के सरताज बप्पी दा ने।
और इसे गाया है कुमार सानू ने।
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