एक आँख मारूँ तो
आज जिस गीत की हम बात करने वाले हैं वो सुनने में तो बड़ा साधारण सा ही लगता है, पर बहुत गूढ़ है अपने अर्थों में। चूँकि इसे समझना आसान नहीं है इसीलिए बुद्धिजीवी वर्ग ने इसे ख़ारिज कर दिया, ताकि उनकी बुद्धि पर सवाल न उठे, लेकिन कभी तो कोई ऐसा आता ही है जो इस अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करे। मैं वही आवाज़ हूँ, जो इन गीतों को इनना साहित्यिक स्थान दिलाने के लिए कृतसंकल्पित हूँ।
80 के दशक में ऐसे साहित्यिक गीत सबसे ज़्यादा बने हैं और जिस टीम ने इन उच्चतम स्तर के गीतों को जनता तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया वो थी बप्पी लाहिरी, इंदीवर, जितेंद्र, जयाप्रदा, श्रीदेवी और संस्कारों की ये आँधी उस वक़्त भी दक्षिण से आई थी जब दक्षिण भारत के निर्माता, निर्देशकों ने वहाँ की संस्कारी कहानियों को हिन्दी में बनाना शुरू किया। दर्शक रातों-रात संस्कारी हो गए थे जैसे आज हुए हैं। रात को पैंट पहनकर सोते हैं और सुबह धोती में पाये जाते हैं। चलिये तो रहस्य को और गहरा न करते हुए इस बेहद खूबसूरत गीत को उजागर किया जाये
#एक_आँख_मारू_तो
एक आँख मारू तो #परदा_हट_जाए
दूजी आँख मारू कलेजा कट जाए
दोनो आँखे मारू तो चोरी पट जाए
छोरी पट जाए
दोनो आँखे मारू तो छोरी पट जाए
छोरी पट जाए
मेरे पैर के तलवों में पसीना आ रहा है इसकी व्याख्या करने में, इतना गूढ़ गीत लिख मारा है इंदीवर साहब ने। तो किशोर दा शुरू करते हैं और एक ऐसे पहलू पर प्रकाश डालते हैं जो अब तक वैज्ञानिकों से भी छुपा हुआ है, वे प्रेम की दुनिया में आँखों का महत्व बता रहे हैं। न न, वैसे नहीं जैसे अब तक फालतू बातें की जाती थीं कि “तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है” या “आँखों में हमने सपने सजाये हैं”। ये तो सबको मालूम है कि सपने आँखों में ही आते हैं, इसमें क्या बड़ी बात कह दी कवि ने? इंदीवर जी इसका एक बिलकुल टेस्टिकल माफ कीजिये, प्रेक्टिकल पहलू सामने रखते हैं। आँख मारना एक बड़ी ही आम सी बात है दुनिया में, इतनी आम कि कोई इस पर ध्यान भी नहीं देता। तो इंदीवर साहब विस्तार से बताते हैं कि एक आँख अगर मारी जाये तो क्या हो सकता है, और दूसरी मारें तो क्या होगा, और अगर दोनों ही फेंक के मार दी तो क्या गज़ब हो जाएगा।
तो हमारा नायक अगर एक आँख मारे तो पर्दा हट जाएगा, और दूजी मारेगा तो साला कलेजा ही कट जाएगा। नायिका के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि पता कर ले कि कौन सी आँख से कलेजा कट सकता है, ताकि उसे वो वाली आँख मारने से रोक सके और अपना कलेजा बचा ले। अच्छा आगे इंदीवर बताते हैं कि दोनों आँखें मारने से लड़की पट जाती है। पर मुझे ये बात थोड़ी समझ नहीं आती, मेरी समझ थोड़ी कम है। क्योंकि अब तक हमें लगता आया था कि दोनों आँखें एक साथ बंद-चालू हो तो इसे तो पलकें झपकाना भी समझा जा सकता है। मुझे पता नहीं, कोई और तकनीक होगी जिसे जितेंद्र जी बेहतर जानते हैं।
इसके जवाब में आशाजी अपनी आँखों का जो प्रोफ़ाइल बताती हैं वो सुनिए –
पहले तो वो चिल्लाती है – भंकस
इंदीवर साहब के अलावा कोई भी इस शब्द का उपयोग नहीं कर सकता था। इस शब्द के साथ कविता को उन्होंने इतना ऊपर उठा दिया है कि वो पृथ्वी से बाहर ही चली गई है। भंकस का मतलब होता है “बकवास”। लड़की उस सब को बकवास कह रही है जो अभी लड़के ने कहा और फिर अपनी आँखों की करामात बताती है –
एक आँख मारू तो रस्ता रुक जाए
दूजी आँख मरूं ज़माना झुक जाए
दोनो आँखे मारू तो छोरा पट जाए
छोरा पट जाए
दोनो आँखे मारू तो छोरा पट जाए
छोरा पट जाए
एक से रास्ता रुकता है, दूसरी से ज़माना झुकता है और दोनों से छोरा पट जाता है। यहाँ मैं देवी जी से थोड़ा असहमत हूँ। एक आँख मारने से रास्ता तो रुकेगा 100%, क्योंकि लड़की आँख मारेगी तो सारे मर्द तो उछलने ही लगेंगे रस्ते के, दूजी आँख से ज़माना भी झुक सकता है, आँख मारने के बाद जहां कहे वहाँ आएंगे सारे ठरकी मर्द पर दोनों आँखें मारने से लड़के नहीं पटते, वो तो पटे पटाये होते हैं। ये सब चोंचले लड़कियों के होते हैं कि बहुत सारे धतकरम करने के बाद पटो और अक्सर तो फिर भी मत पटो। लड़के इस मामले में निहायत ही सरल और सीधे होते हैं। उन्हें किसी बनावट से कोई लगावट नहीं, वे “रैडि-टु-पट” होते हैं, जैसे रैडि टु कूक खाना आता है? लड़की सिर्फ नज़र भर कर देख ही ले तो ये बेचारे पट जाते हैं। इनके और बहुत सारे नखरे भी नहीं होते कि ऐसी चाहिए, वैसी चाहिए। बहुतों के लिए तो सिर्फ लड़की है, यही पर्याप्त होता है।
ख़ैर, आगे बढ़ते हैं। लड़की की इस बात पर लड़का तुरंत उससे बदला लेता है चिल्ला कर – हे भंकस।
ये एक छोटी सी चीज़ आपको क्लू देती है कि आगे चलकर जब ये शादी कर लेंगे तो इनके बीच क्या होगा, जो कि शास्वत सत्य है। आगे इनको आँखें, नहीं ताने मारने हैं।
“कुछ मीठी कुछ खट्टी बाते है, अटपटी तेरी अंगूरों के जैसी
नटखटी नटखटी चटपटी चटपटी जवानी मिर्ची के जैसी”
इसमें इंदीवर जी ने “टी” का उपयोग करके जो छंद बनाया है वो तुलसीदास भी नहीं बना पाते। जवानी को मिर्ची की उपमा, मुझे तो याद नहीं अब तक किसी ने दी हो, और क्या सटीक उपमा है आप समझ ही सकते हैं।
लड़की - होंठों पे मिर्ची जो रख लेगा तू तरसे जो एक बार चख लेगा तू
लड़का - यौवन पे चलता नही क़ाबू शोलो से खेलेगे मै और तू
ये वार्तालाप यक्ष और युधिष्ठिर के संवाद की ही तरह ज्ञानवर्धक है। लड़की मिर्ची के तीखेपन और उसकी लत, दोनों के लिए चेतावनी दे रही है। लड़का यौवन की दुहाई देकर कहता है कि मिर्ची चाहे शोलों जैसी तीखी हो पर हम उससे खेलेंगे, पर दोनों एक साथ।
इसके बाद गाना देखिये किस तरह समाज के एक महत्वपूर्ण भाग, हमारे अन्नदाता किसानों को छूता हुआ निकलता है –
“बीज और पानी मिले तो जवानी आ जाये खेतों पे जैसे”
कौन सा गाना है जो एक ही पंक्ति में ये बता देता है कि बीजों के लिए पानी बहुत ज़रूरी है। इसलिए पानी बचाना हम सबका कर्तव्य है। उस पानी से ही खेतों पर जवानी आएगी, अर्थात फसलें लहलहायेंगी और हम सब खुशहाल रहेंगे। यहाँ आकर ये गीत साहित्य के उच्च स्तर को छू लेता है। और फिर इस सामाजिक मुद्दे को शारीरिक मुद्दे से कैसे अगली ही पंक्ति में जोड़ दिया है वो आपकी दाद के काबिल है।
“हम तुम मिलेंगे तो मिलते रहेंगे लहराएँ फसलों के जैसे”
आहाहा! इन दोनों का मिलन भी हरियाली लाएगा, खुशहाली लाएगा। प्रेम की ऐसी अभिव्यक्ति दुर्लभ है। इसके बाद नायक और भी स्पेसिफिक हो जाता है –
“गन्ने के खेतों में मैं और तू, सुनेंगे कोयल की कू कू कू”
आप देखिये, खेत भी गन्ने के होने चाहिए क्योंकि गन्ने में मिठास है। गुड़ हो या शक्कर, बनती गन्ने से ही है, उस गन्ने के बीच से कोयल की कूक जब गुज़र कर कानों में पड़ेगी तो क्या और मीठी नहीं हो जाएगी? ये वाला पहलू समझने में आज तक लोग नाकाम रहे हैं, शायद इसीलिए इस गाने को इसकी वो जगह नहीं मिली। बहुत गूढ़ अर्थों वाला है ये गीत। हमने इससे पहले स्त्री 2 के गीत की बात की थी जिसमें नायक ने नायिका को खेतों में बुलाया और वो आई नहीं। ये नायिका आधुनिक है, इसे नहीं पता है कि गन्ने के खेत में कोयल की आवाज़ सुनना आध्यात्मिक अनुभव है। आजकल की भौतिक दुनिया में यही समस्या है, फिर भी उस नायक ने एक खेत ढूँढा था पर नायिका उसका महत्व नहीं समझी। जबकि ये पूरा गाना ही दोनों अलग-अलग प्रकार के खेतों में नाचते हुए गाते हैं। ये पूरी तरह से भारतीय, हमारी सभ्यता संस्कृति से जुड़ा हुआ गाना है। उस पर जितेंद्र और श्रीदेवी ने जिस प्रकार का नृत्य प्रस्तुत किया है वो नृत्य के रूढ़िवादी ढाँचे को तोड़ता है, इस मायने में ये आधुनिक भी है। क्यों एक ही तरह की भाव भंगिमा हो? आम आदमी शास्त्रीय नृत्य थोड़ी जानता है, वो तो जैसे ही मस्ती में कूदने लगता है, नृत्य हो जाता है।
मैं सरकार से अपील करूंगा कि इस गीत को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाये और हर नागरिक को इसे सुनना अनिवार्य किया जाये। मैं तो कहता हूँ थिएटर में फिल्म शुरू होने से पहले एक बार इस गीत को ज़रूर दिखाया जाये ताकि लोग अपनी सन्स्क्रूती से जुड़े रहें। आप भी आज इस लेख को पढ़ने के तुरंत बाद एक बार ज़रूर सुनें और गुनें।
अगली बार एक और महान रचना के साथ उपस्थित होता हूँ, तब तक “एक आँख मार दी है आपको”।
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