प्यार चाहिए कितनी बार?


 

आज आपके लिए सबसे कठिन, सबसे जटिल गाना लेकर आया हूँ। मेरा दावा है कि आधे लोग अब तक इसका मतलब नहीं समझते होंगे। 

ऐसे कालजयी गीत को इतना उपेक्षित कर रखा है कि अब कोई नामलेवा ही नहीं बचा। पर अब भी मेरे जैसे क्रांतिकारी लोग हैं जो इन दबे-कुचले वर्ग की आवाज़ उठा सकते हैं। वामपंथियों ने यहाँ भी अपना कारनामा किया और ऐसे महान गीतों को बेहूदा बताकर कभी ऊपर नहीं आने दिया। “मेरा कुछ समान” जैसे फालतू गीतों को ये लोग महान बताते रहे जबकि ये माटी का सच्चा सपूत गीत है, जैसे हमारे दूसरे कट्टर भाई होते हैं। और इतना पारिवारिक है कि छोटे बच्चों को भी सुनाया जा सकता है, बच्चे 5 ही मिनट में दस तक गिनती सीख जाएंगे। गीत की शुरुआत ही गिनती से होती है, और वो भी हिन्दी गिनती, आजकल के जैसे वन, टू, थ्री, फोर नहीं। बच्चों को अपनी भाषा, अपनी संस्कृति सीखना महत्वपूर्ण है, और इसीलिए ये गीत राष्ट्रवादी स्टेटस पा जाता है। 

तो 80 के दशक में इस झंडू आंदोलन के झंडूबरदार, मेरा मतलब है झण्डाबरदार इंदीवर साहब लिखते हैं –

“एक दो तीन चार, प्यार चाहिए कितनी बार

पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दस

बस, बस, अरे बस”

और इस बस के बाद बप्पी दा अपना करिश्मा दिखाते हैं, नायिका दोहराती है बस, तो बप्पी दा पीपड़ी पर बजाते हैं – “टा ण ण ण” फिर एक बार बस और फिर तीन बार - “टा ण ण ण”, “टा ण ण ण”, “टा ण ण ण”

अद्भुत जुगलबंदी!

ये पीपड़ी नायक के मन की बात कह जाती है। इसके बाद शुरू होता है मुहावरों का प्रयोग, जो हिन्दी गीतों में दुर्लभ है। 

“तुर्की बा तुर्की, हिन्दी बा हिन्दी

तुर्की बा तुर्की, हिन्दी बा हिन्दी

कबूतर बा कबूतर बाज़ बा बाज़

करते हैं हम जुबां सात परवाज़”

तुर्की बा तुर्की एक मुहावरा है जिसका मतलब होता है “उसी ज़बान में जवाब देना”। और आप इंदीवर साहब के जीनियस को सलाम करेंगे जब जानेंगे कि इसी तर्ज़ पर उन्होने अपना शुद्ध देसी मुहावरा भी जड़ दिया “हिन्दी बा हिन्दी”। तुर्की बा तुर्की क्यों हो? हम हिन्दी हैं तो हिन्दी बा हिन्दी होना चाहिए। ऐसे ही लोगों की वजह से देश बचा हुआ है। ये गाना इतना कठिन है कि इतने हिस्से का अर्थ समझते-समझते मेरी पूरी energy drain हो गई और इस अगली लाइन को समझना मेरे लिए टेढ़ी खीर हो गया। कबूतर बाज वो होता है जो कबूतरों की लड़ाई करवाता है, परवाज़ का मतलब होता है उड़ान, कबूतर बाज़ की जुबां को सात उड़ान क्यों भरवा रहे हैं इंदीवर जी ये मेरी छोटी सी समझ से बाहर है। आपको समझ आए तो कृपया मुझ अकिंचन को भी समझाएँ। 

इस कालजयी गीत पर लाल बनियान के ऊपर काली जाकेट डाल कर, भयंकर नृत्य किया है हमारे प्रभु जी, मिथुन दा और सपनों की रानी श्रीदेवी ने। इसे गाया है दानेदार, खुरदरी आवाज़ के मालिक “सुदेश भोसले” और हमारी अपनी मेडोना “अलिशा चिनोय” ने। बचपन में मैं भी ये डांस ट्राइ कर चुका हूँ, तब ब्रेक डांस का क्रेज़ था। ये शाहकार फिल्म “वक़्त की आवाज़ (1988)” में नमूदार हुआ था। ज़रूरत है ऐसे भाषा, संस्कृति, व्याकरण को बढ़ावा देने वाले गीतों की जिन्हें बच्चों को सुनाकर उनका भी ज्ञानवर्धन किया जा सके। मनोरंजन का मनोरंजन, ज्ञान का ज्ञान, इसे कहते हैं आम के आम, गुठलियों के दाम। ऐसे सार्थक गीत न तब से पहले बने, न अब बनते हैं। आप भी सुनिए और बताइये कितना अच्छा लगा, क्योंकि बुरा लगने का तो सवाल ही नहीं। 

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