खेतों में तू आई नहीं
हालाँकि मेरा ऐसा मानना है कि आज हम संगीत के स्वर्ण युग में रहते हैं, जब कि हर एक गाना झंडू गाना है। मैं इसीलिए आज के गीतों की बात नहीं करता इस सिरीज़ में, क्योंकि आप आँख बंद करके कोई गाना उठाइए, वो झंडू ही निकलेगा। ऐसी सुविधा पहले उपलब्ध नहीं थी। पहले इन गीतों के साथ भेद-भाव किया जाता था, इन्हें खोजना पड़ता था। इसलिए मैं उस वक़्त में रुचि रखता हूँ, और उस वक़्त जिन गीतों के साथ अन्याय हुआ, उन्हें न्याय दिलाने की कोशिश करता हूँ, उनके सच्चे अर्थों को बयां करके।
लेकिन ये बिल्कुल नया एक गाना ऐसा है जिसने खुद को मुझसे चुनवाया है। ये हर जगह मेरे सामने आकर खड़ा हो जाता है कहते हुए – “मैंने तुझे चुन लिया, तू भी मुझे चुन, सुन साहिबा सुन”।
तो आख़िर मैंने भी इसे चुन लिया। गायकी, धुन और कविता के मामले में ये गीत भोजपुरी गीतों के महान स्तर को छूता हुआ सा प्रतीत होता है। और क्यों न हो इसे गाया भी तो महान गायक “पवन सिंह” ने है। रफी, किशोर वगैरह वामपंथियों की वजह से टॉप पर बैठा दिये गए हैं, उनमें है कुछ नहीं। बोर से गाने गाये हैं उन्होंने। असली गायक तो आज सामने आ रहे हैं। तो ये गीत बड़ा ही प्रेरणास्पद भी है और साथ ही साथ शिक्षास्पद भी है। हालाँकि इसे बड़ी हास्यास्पद सिचुएशन में उपयोग किया गया है।
तो नायक नायिका से शिकायत करते हुए कह रहा है –
“झूठी खाई थी कसम जो निभाई नहीं
काटी रात मैंने खेतों में तू आई नहीं”
और ये शिकायत वो नाचते-नाचते कर रहा है। ये समाज में एक बड़ा बदलाव आप देख रहे हैं। पहले के ज़माने का नायक, रोते-बिसूरते कहता –
“तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूठ जाना
के खुशी से मर न जाते अगर एतबार होता”
ऐसी बेतुकी बातें कौन करता है भाई? आप बताइये, आप करते हैं? सीधी बात नौ बकवास – तूने कसम झूठी खाई थी कि खेत में आएगी, मैं पूरी रात इस खेत से उस खेत होता रहा पर तू आई नहीं”। फिलहाल तरक्की का संक्रमणकाल है इसलिए ये लाइन भी अधूरी है। मुझे पूरी उम्मीद है कि हम इतनी तरक्की करेंगे कि इस लाइन के बाद एक गाली भी आए, और आनी ही चाहिए। असल सिचुएशन में “मर्द” वही करता।
इसके बाद नायक कहता है कि वो घर से नई वाली रज़ाई लाया था। अब सोचिए कितना ख़याल रखता है वो नायिका का। चूँकि खेत में ठंड लग सकती है तो उसे ओढ़ाने के लिए रज़ाई भी लाया है और वो भी बिलकुल नई झक। सोचो घर से उठाकर चला होगा तो घरवालों ने, पड़ोसियों ने पूछा होगा कि रज़ाई लेकर कित्थे चले? कितने सवालों का सामना करके बेचारा खेत तक पहुंचा होगा। लेकिन वो आई ही नहीं। फिर मैं सोचता हूँ, शायद इसलिए नहीं आई हो कि रज़ाई ले आया पर गद्दा तो लाया ही नहीं? पर फिर भी उसे आना चाहिए था। यहाँ आकर आपको नहीं लगता कि ये गाना दर्द के उच्चतम शिखर को छू लेता है?
पर नायिका भी जवाब देती है, देखिये क्या कहती है –
“निकल रही थी मैं तो सज के सँवर के
टोका मेरी अम्मा ने आँखें बड़ी कर के
हो बोली मुझे क्यों री कहाँ चली कलमुही
खेतों में कुंवारी छोरी जाती नहीं यूँ ही”
ये जो अम्मा है इसकी शादी मिलेनियम के समय हुई होगी, याने सन 2000 के आसपास, तभी आज 2024 में बेटी खेत में जाने क़ाबिल हुई है। वो वक़्त भी बड़ा मॉडर्न हो चुका था और लड़कियाँ खेतों में आती-जाती थीं। फिर इसकी अम्मा ऐसी दक़ियानूसी कैसे रह गई? जो भी हो उसे पता तो है कि खेत में क्यों जा रही है और वो अपनी बिटिया को रोकने का प्रयत्न कर रही है। ये इस गीत में वात्सल्य का पुट है जिसके लिए गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य जी का सम्मान किया जाना चाहिए। अम्मा बहुत प्रेक्टिकल भी है इसलिए सीधे बोल देती है कि कुंवारी छोरी खेतों में नहीं जाती। पर इससे सवाल ये पैदा होता है कि कुँवारी नहीं जाती तो शादीशुदा क्यों जाती है? ख़ैर, अम्मा इसके आगे एक ही लाइन में बहुत बड़ी शिक्षा दे देती है, और उसी के लिए मैंने कहा कि ये गीत शिक्षास्पद है –
“ऐसे लड़के जो खेतों में बुलाते हैं
बेटी बनते कभी भी वो जमाई नहीं”
आहा! गागर में सागर। बड़े लोगों की बातें अनुभव का निचोड़ होती हैं, उन्हें नई पीढ़ी को मानना चाहिए। ये बात सिर्फ गावों पर लागू होती हो ऐसा नहीं है, शहरों के खेत कुछ और नाम से हैं।
तो नायिका नहीं आ रही थी ऐसा नहीं है, वो आना चाहती थी। उसे भी ख़याल था नायक की मुश्किल का, उसे भी नई वाली रज़ाई देखनी थी कैसी बनी है, कितने की बनी है वगैरह पर हाय रे अम्मा।
नायक अगला दुख बताता है –
“ढल जाये रे जवानी इंतज़ार में
तेरे चक्कर में दूसरी पटाई नहीं”
नायक यूँ ही खेतों में इंतज़ार करता रहेगा तो जवानी कब तक रहेगी? उसे अब ये खयाल आने लगा है कि इसकी बजाय दूसरी पटा लेता तो वो तो आ ही जाती खेत में। अब वो दुविधाग्रस्त अलग हो गया है, एक तो न मिलने का दुख, घर से नई रज़ाई लाने का दुख और उस पर ये दुविधा। नायक के इतने दुखों को सुनकर नायिका अपनी माँ को याद करके चीखने लगती है – “ऊई माँ ऊई माँ ऊई माँ”
मुझे खुशी है कि प्रेमी इतना एवोल्व हो गया है कि अपने दर्द खूब नाच-नाचकर बयां करता है, अताउल्लाह ख़ान नहीं बनता, जो रो-रो कर कांपती आवाज़ में बोर करता हो।
ये गीत हमारे समाज को एक कदम और आगे ले जाने वाला गीत है। इस गीत को रचा है संगीतकार “सचिन-जिगर” ने जिन्होंने ऐसे कई क्रांतिकारी गीत रचे हैं जैसे – “चार बज गए लेकिन पार्टी अभी बाकी है”। ये भी अपने आप में बहुत ही साहित्यिक और क्रांतिकारी गीत था।
फ़िल्म “स्त्री 2” की कहानी से इस गीत का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था फिर भी उन्होंने इस मानीखेज गीत को अपनी फ़िल्म में स्थान दिया इसके लिए इसके निर्माताओं को लख-लख धन्यवाद। इन शब्दों को अपनी बेहतरीन आवाज़ देने के लिए पवन सिंह, सिमरन चौधरी और दिव्य कुमार की भूरी-भूरी प्रशंसा करता हूँ।
आप दिन में एक बार इस गीत का आचमन ज़रूर करें।
हरी ॐ।
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