तेरे बाप के डर से
साहित्य के उच्चतम शिखर पर पहुँच कर शब्द वापस लोक ज़बान में घुस जाते हैं। ये गीत भी उस उच्चतम स्तर पर पहुँच कर कूद गया, और मिट्टी सूँघ गया। इतनी खूबसूरत आसपास की शब्दावली है, कि ऐसा लगता है जैसे पान की दुकान पर गुटखे का रस धीरे-धीरे जबड़े में घोलते हुए कानों में उसके साथ ही निकोटिन की तरह घुस रही है। इस गीत में नायक, नायिका को ये चौंकाने वाली जानकारी दे रहा है कि वो उसे भगा लाया है और फिर ये भी बता रहा है कि वो उसके “बाप” के डर से भगा कर लाया है। गौरतलब बात है कि वो पिताजी या पापा जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं कर रहा है, बाप कह रहा है। “बाप” में एक वज़न है, ऐसा लगता है कि कोई खतरनाक आदमी है, जबकि पिताजी सुनकर कोई गांधी टोपी लगाए दुबले-पतले, मरियल से मास्टर की इमेज निगाहों में आती है। तो इस तरह वो नायिका के पिता को एक मजबूत छवि दे रहा है, पर लोग इसे गलत ही समझते हैं। जबकि हर जगह “माँ-बाप” शब्द ही प्रयुक्त होता है। अब इसके और ऑप्शन क्या हो सकते हैं?
“बाबूजी”, ये शब्द सुनते ही एक बिलकुल ही दयनीय छवि बनती है।
“पापा” – ये पाश्चात्य संस्कृति है, हमें मान्य नहीं।
“डैडी” – चुप हो जा, इस बात पर दंगे हो जाएंगे।
चलिये बाप पुराण लंबा हो गया, आपको गाना बताता हूँ=
“मैं तुझको भगा
लाया हूँ तेरे घर से
तेरे बाप के डर से
तेरे बाप के डर से
जाऊँगा दूर लेके तुझे
सब की नज़र से
तेरे बाप के डर से”
इस अद्भुत जानकारी पर नायिका भी रहस्योद्घाटन करती है -
“मैं संग तेरे
भाग चली मेरे घर से
मेरे बाप के डर से
मेरे बाप के डर से
जाऊंगी दूर लेके
तुझे सब की नज़र से
मेरे बाप के डर से
वो कह रही है कि तू कोई जानकारी नहीं दे रहा है, मैं अपनी मर्ज़ी से ही भागी हूँ तेरे साथ, मुझे मालूम था कि तू भगाने आया है। और तू क्या मुझे बता रहा है कि किसलिए भगाया, मैं खुद अपने बाप के डर से भागी हूँ। वो भी “बाप” शब्द ही use करती है, क्योंकि मैं आपको कह रहा हूँ कि वही उपयुक्त है। इसकी अगली पंक्ति में ज़रूर conflict पैदा हो रहा है। घर से तो दोनों भागे पर अब कौन किसको सबकी नज़र से दूर ले कर जाएगा, ये झगड़ा है। नायक कहता है मैं ले कर जाऊंगा और नायिका भी कहती है मैं लेकर जाऊँगी। इस गीत में कहानी के तत्व हैं।
अब अंतरा देखिये -
“ज़ालिम है सितमगर है वो प्यार का दुश्मन
बनने नहीं देगा वो तुझको मेरी दुल्हन”
नायक बाप से बहुत चिढ़ा हुआ है इसलिए अब वो गीत को बाप पर केन्द्रित कर देता है। और इन पंक्तियों से मेरी बात और भी स्पष्ट होती है कि “बाप” ही क्यों? क्योंकि वो ज़ालिम है, सितमगर है, अमरीश पुरी है क्योंकि प्यार का दुश्मन है। उसने अपनी बेटी भी प्यार से नहीं दुश्मनी से पैदा की थी। और वो आदमी इसे इसकी दुल्हन नहीं बनने देगा। इसके जवाब में नायिका क्या कहती है?
“हम ब्याह रचाएंगे कहीं दूर शहर से
मेरे बाप के डर से मेरे बाप के डर से”
कि शहर खतरे से खाली नहीं हैं और हमारे देश की आत्मा गावों में बसती है तो हम शहर से दूर किसी गाँव में “ब्याह” कर लेंगे। अब देखिये कितनी खूबसूरत और मीनिंगफुल शब्दावली है। “शादी” का उपयोग नहीं कर रही हो, क्योंकि शादी तो उर्दू है, और उसे मालूम था कि एक दिन इस देश में भाषा, जानवर और यहाँ तक कि भवनों को भी हिन्दू मुसलमान में बाँटा जाएगा तो वो पहले ही अपना संस्कृति प्रेम जता रही है ताकि बाप के अलावा कोई बजरंगी दुश्मन न हो जाये। तो वो ठेठ शब्द “ब्याह” उपयोग करती है। बड़ी चतुर नार है। और कारण फिर से अपने बाप को ठहरा रही है।
अगली पंक्तियों में नायक अपने इस कृत्य को justify करने की कोशिश कर रहा है कि अगर भागते नहीं तो क्या होता -
“ले जाएगा कमरे में हमें बंद करेगा
मिलना वो तेरा मेरा न पसंद करेगा
धक् धक् सी दिल में होती है ऐसी खबर से
तेरे बाप के डर से तेरे बाप के डर से”
लड़के-लड़कियों का भागना एक पुरातन रिवाज है। हर युग में भागते रहे हैं और बाप के डर से ही भागते आए हैं। तो ये गीत सदियों से चली आ रही एक समस्या की ओर सबका ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करता है। इसीलिए इसे बहुत उच्च दर्ज़ा प्राप्त होना चाइए। ये गीत सभी बापों को ये बताने का प्रयास करता है कि “डराओ मत” अगर इस भागने-भगाने के रिवाज को खत्म करना है। पर आज 25 साल से ज़्यादा बीत जाने के बाद भी बाप लोग इससे सीख नहीं ले पाये हैं। शायद वे इस कालजयी और महान गीत का मर्म नहीं समझ पाये, आज शायद मेरी व्याख्या के बाद समाज में कुछ बदलाव हो और इस गीत को इसका सही स्थान मिले।
मेरा ये झंडू आंदोलन ऐसे ही दलित गीतों को सम्मान दिलाने की कोशिश है जिसमें आपका पूर्ण सहयोग अपेक्षित है।
इस महान गीत के रचियता, ग़ालिब से कई गुना ज़्यादा प्रतिभाशाली “समीर” जी हैं और इसे धुन में बांधने का गुनाह किया है “आनंद-मिलिंद” ने। फ़िल्म “हीरो न. 1” में गोविंदा के लिए इसे गाया था “कुमार सानू” ने और करिश्मा कपूर के लिए “अल्का याज्ञनिक” ने।
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