ए हिश टाँय टाँय फिश

 

झंडू गाने – 4

देखिये, मैंने एक बहुत महान बीड़ा उठाया है। मैं उन कालजयी गीतों को उनके काव्यात्मक और दर्शनात्मक पहलुओं के साथ आपके सामने ला रहा हूँ, जिन्हें बिना समझे ही ख़ारिज़ कर दिया गया और अधिकांश लोगों ने तो सुना ही नहीं है। ये अन्याय है इन गीतों के साथ जो मनुष्यता की आदिम प्रवृत्ति को ईमानदारी से उजागर करते हैं। आम आदमी के दिलो-दिमाग में भसड़ मचाये ख़यालों को थोड़ा घुमावदार तरीके से लेकिन टू दी पॉइंट कहते हैं। 

आज का जो गीत मैं आपको बताने जा रहा हूँ वो महान गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने, अपने करियर के अंतिम दौर में समझ के उच्चतम स्तर पर पहुँच कर लिखा था। उन्हें जीवन भर “हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह” जैसे बेतुके गीत लिख कर समझ आया कि जीवन का सार ये नहीं है, ये सार उन्हें नए निर्माताओं और निर्देशकों ने समझाया, नई जनता ने समझाया और तब इस सार को उन्होने फ़िल्म “गुरुदेव” में कुछ यूँ बयान किया –

“ए हिश टाँय टाँय फिश

सच्ची सच्ची कहता हूँ मैं झूठ न बोलूँगा

मैं झूठ न बोलूँगा

इक दिन तेरा धीरे से दरवाज़ा खोलूंगा

आहा ओहो आहा ओहो

हे खेल मिलन का सारी-सारी रात खेलूँगा

इक दिन तेरा धीरे से दरवाज़ा खोलूंगा”

अब लोग इसे गलत अर्थों में लेते हैं, मैं उन अर्थों को नहीं मानता। ऐसे तो हर बात के दो अर्थ निकाले जा सकते हैं। कहने को तो आजकल लोग 14 के भी गलत मतलब निकालते हैं, तो क्या वही मतलब समझा जाये हमेशा?

यहाँ नायक नायिका की ना ना से परेशान होकर बड़ी मासूमियत से सिर्फ़ इतना कहना चाहता है कि एक दिन जब अंधेरा हो जाएगा तब चुपके से आऊँगा और तेरे घर का दरवाज़ा आहिस्ता से खोल कर अंदर आ जाऊँगा। रात में इसलिए ताकि कोई पकड़ के कूट न दे। फ़िर खेल मिलन का मतलब वही कि ये प्यार का इज़हार करेगा, वो मना करेगी, ये फ़िर कहेगा, वो फ़िर ना कहेगी और नायक कह रहा है कि मैं पूरी रात जाग कर इज़हार करता रहूँगा। ऐसा कहने का कारण ये है कि शायद इस dedication से नायिका इम्प्रेस हो जाये?

तो मजरूह साहब ने एक अंतरे में नायिका को और भी convince करने के लिए नायक की ताक़त और dedication का पता देने के लिए उससे कहलवाया –


“अरे हिस्स ये भी कोई घोड़ी है निगोड़ी

बहुत चले तो दुलकी भागे 

आगे टाँय टाँय फिस्श

अरे छोड़ो भी ये नन्ही घोड़ी ख़ाक दौड़ेगी

दो गज़ दौड़ेगी दस बार पसीना छोड़ेगी

मुझ पर बैठो तुमको लेकर सरपट दौडूंगा

एक दिन तेरा धीरे से दरवाज़ा खोलूंगा”


आप फ़िर इधर-उधर निकल रहे हैं, नायक अपने आप को कार से भी ज़्यादा ताकतवर बता रहा है। वो अपने घुटनों पर इतना गर्व करता है कि कर के पहियों से भी तेज़ भाग सकते हैं। आप कभी सोच भी सकते हैं कि कम से कम 60-65 किलो की लड़की को अपनी पीठ पर बैठाकर सरपट दौड़ पाएँ। दो कदम नहीं चल पाएंगे। इसके लिए दिल में मोहब्बत की आग चाहिए जो हमारे नायक में है। 

ये फ़िल्म बनाई थी “विनोद मेहरा” ने और इस फ़िल्म को अधूरा छोडकर ही वे चल बसे थे जिसे फिर राज सिप्पी ने पूरा किया था। अनिल कपूर, ऋषि कपूर और श्रीदेवी जैसे बड़े सितारे थे और ये गीत अनिल कपूर और श्रीदेवी पर फिल्माया गया था फिर गलत कैसे हो सकता है? हैं? उस पर फिल्म का नाम इतना सात्विक है। 

इसे संगीतबद्ध किया था आर डी बर्मन ने जो उस समय अपने सबसे ख़राब दौर में चल रहे थे और जो कहा जाये बना रहे थे, और इसे गाया था अमित कुमार ने। 

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